कोरोना अटैक से बचाव के लिए आदिवासी जीवनशैली अपनाएं

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प्रदीप द्विवेदी

कोरोना वायरस अटैक ने आर्थिक और शारीरिक नुकसान से ज्यादा मानसिक तनाव दिया है. इसके डर के कारण जिन्दगी ठहर-सी गई है, बदल गई है.कोरोना वायरस अटैक का सबसे ज्यादा असर होरिजेंटल गांवों के बजाय वर्टिकल शहरों पर हुआ है, लिहाजा आदिवासी जीवनशैली अपना कर भविष्य में कोरोना जैसी कोई भी जंग जीती जा सकती है.
हालांकि, कोरोना वायरस अटैक के बाद दो खबरें उत्साह बढ़ाने वाली हैं कि भारत में कोरोना से मृत्युदर बेहद कम रही है और इसकी दवाई भी जल्दी ही बाजार में उपलब्ध होगी.
लेकिन, कोरोना ने खतरे की घंटी भी बजा दी है! यह साफ है कि कोरोना जैसा वायरस कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं है, लिहाजा इस बात की क्या गारंटी है कि कोरोना जैसा कोई और वायरस आने वाले समय में सामने नहीं आएगा? हम विभिन्न महाशक्तियों की गारंटी कैसे ले सकते हैं कि वे कोरोना जैसी गंदी हरकत भविष्य में नहीं करेंगी? तो, क्या तब भी फिर ऐसी ही भगदड़ मचेगी?
कोरोना वायरस ने कई उपलब्धियों को आपदा में बदल दिया है? छह माह पहले जो लोग गर्व से बताते थे कि मेरा बेटा अमेरिका जा रहा है, आज वही मां-बाप डरे हुए हैं कि पता नहीं बेटा कब विदेश से घर आ पाएगा? कोरोना वायरस से जितने लोगों की मौत नहीं हुई है, उससे लाख गुना ज्यादा युवा सपनों की मृत्यु हो गई है!बीसवीं सदी में गांव-कस्बे अभावग्रस्त थे, इसलिए रोजी-रोटी के लिए लोगों को महानगर जाना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. जो सुविधाएं मुंबई जैसे महानगरों में हैं, वैसी ही सुविधाएं छोटे-छोटे गांव-कस्बों में मिलने लग गई हैं. फोर-जी ने छोटे से छोटे गांव को पूरी दुनिया से जोड़ दिया है, तो टीवी ने गांव और शहर का फर्क ही खत्म कर दिया है। जो काम मुंबई जैसे महानगर में हो सकता है, वहीं काम छोटे शहर में बैठ कर भी हो सकता है. जबकि, मुंबई में रहने के लिए जिस व्यक्ति को किराए, आनाजाना, पानी-बिजली-गैस, जैसे खर्चों के लिए प्रतिमाह कम-से-कम पचास हजार रुपए चाहिए, यदि वही व्यक्ति अपने गांव, अपने घर में रहता है तो पांच हजार रुपए पर्याप्त हैं? अब समय आ गया है कि लोग अपने और अपने बच्चों के भविष्य की प्लानिंग के लिए मुंबई, अमेरिका जैसी जगहों को फोकस करने के बजाय अपने गांव-कस्बे के सापेक्ष सोचे?आज महानगरों के सापेक्ष गांव सस्ते और सुविधाजनक भी हैं, यदि केवल भौतिक संसाधन प्राप्त करने की अंधी दौड़ के बजाए, जीवन के असली सुख और संतोष के बारे में सोचेंगे तो कदम कभी महानगरों की ओर नहीं बढ़ेंगे? सोने के पलंग से सोने का सुख ज्यादा जरूरी है?
आदिवासियों का जीवन खेतघर पर आधारित रहा है, जहां उनका घर है, वहीं उनके खेत भी हैं, वहीं उनके पालतू पशु भी हैं और वहीं परिवार का हर सदस्य कामकाज में सहयोग देता है. अब इंटरनेट ने उन्हें पूरी दुनिया से जोड़ दिया है.
अधिक-से-अधिक भौतिक संसाधन प्राप्त करनेे की अंधी दौड़ ने लोगों का संतोष छिन लिया है. यदि लोग आदिवासी जीवनशैली अपना लें, तो कोरोना का सारा डर हवा हो जाएगा. जरूरत इस बात की है कि गांव-कस्बों की क्षमता और कमियों के सापेक्ष योजनाएं तैयार की जाएं.यदि दिखावे का जीवन छोड़ कर खेती-किसानी, पशुपालन, वाटर हार्वेस्टिंग, सोलर एनर्जी जैसे कार्यों पर ध्यान दिया जाए और पूरी दुनिया से जुड़े रहने के लिए, अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए इंटरनेट का उपयोग किया जाए तो किसी महानगर के नर्क के बजाय स्वर्ग से सुंदर गांव-कस्बे और छोटे शहर की जिंदगी होगी!

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