झारखंड राज सभा चुनाव में पक रही है भाजपा की वापसी की खिचड़ी

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कविकुमार

जमशेदपुर, 12 जून : झारखंड में 19 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव को भारतीय जनता पार्टी सत्ता में वापसी का एक अवसर मान रही है। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक ‘झारखंड फतह’ का यह अभियान बड़े ही गोपनीय तरीके से चलाया जा रहा है।राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी को इस तरह का कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके पास अपने प्रत्याशी दीपक प्रकाश को विजयश्री दिलाने के लिए पर्याप्त वोट हैं। भाजपा के सहयोगी दल रह चुके आजसू ने भी भाजपा को अपना समर्थन देने का एलान कर दिया है। इसके साथ ही जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा के निर्दलीय विधायक सरयू राय और बरकट्ठा के निर्दलीय विधायक अमित यादव, जो पहले भाजपा में ही थे, अपना समर्थन भाजपा के प्रत्याशी को देंगे। इस तरह राज्यसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी की जीत तय है, फिर भी पर्दे के पीछे से सारी कसरत झारखंड की सत्ता में वापस लौटने की शुरुआत के रूप में देखी जा रही है।मौजूदा स्थिति में झारखंड विधानसभा में कांग्रेस के 16 विधायक हैं, इनमें से 12 विधायक असंतुष्ट बताए जाते हैं। असंतुष्टों में दो मंत्री भी शामिल हैं। इनके नाम  स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता और कृषि मंत्री बादल पत्रलेख बताए जाते हैं। विधायकों की नाराजगी का कारण मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कार्य प्रणाली नहीं बल्कि विधायकों की सीनियरिटी की उपेक्षा बताई जाती है। इन विधायकों को भारतीय जनता पार्टी के तरफ से बढ़िया ‘पैकेज’ मिलने पर ये अपने वोट भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी को दे सकते हैं। कहते हैं कि कांग्रेस के ऐसे विधायकों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। जबकि क्रॉस वोटिंग करने पर उन्हें बहुत कुछ मिल सकता है। इस संदर्भ में बातचीत के दौर भी प्रारंभ होने की सूचना है। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ये विक्षुब्ध कांग्रेसी विधायक अपने प्रथम प्रायोरिटी के वोट भी भाजपा को देने में घबराएंगे नहीं। क्योंकि वे ऐसा करने का मन बना कर ही वोट देने जाएंगे। बाद में चाहे कांग्रेस उनको पार्टी से बाहर का रास्ता क्यों न दिखा दें। जो विधायक इतनी हिम्मत नहीं कर पाएंगे वे अपने सेकंड प्रायोरिटी का वोट तो जरूर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में डालेंगे, क्योंकि सेकंड प्रायोरिटी का बोर्ड गोपनीय होता है। ऐसा करने पर कांग्रेस इन विधायकों को निलंबित कर सकती है। परंतु भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाने के बाद उनके लिए फिर से चुनाव लड़कर विधायक बनने का चांस रहेगा। जैसा कर्नाटक और मध्य प्रदेश राज्य में हो चुका है। फिलहाल कांग्रेस के पास डैमेज कंट्रोल का कोई प्लान नहीं है। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के विधायकों के सामान झारखंड मुक्ति मोर्चा के कुछ नाराज विधायकों पर भी भारतीय जनता पार्टी अपने डोरे डालेगी। मोर्चा के ऐसे विधायक भी काफी सीनियर हैं और अपनी उपेक्षा के कारण हेमंत सोरेन से नाराज हैं। ऐसे कुछ विधायक यह जानते हैं कि अगले चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा उन्हें टिकट नहीं देगा और न जनता उन्हें वोट देगी। वैसी स्थिति में भारतीय जनता पार्टी के भारी-भरकम पैकेज को ठुकराना उनके लिए फायदेमंद नहीं होगा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के ऐसे विधायकों की संख्या 6 से 7 बताई जाती है। जानकार लोगों का कहना है कि भाजपा को सत्ता में लाने के लिए खिचड़ी फरवरी माह के अंत से चूल्हे पर चढ़ चुकी थी। मार्च 2020 के अंत तक इसे पक कर तैयार हो जाना था। परंतु कोरोनावायरस के कारण यह खिचड़ी पक नहीं पाई। राज्यसभा चुनाव के मौके पर फिर से खिचड़ी पकाने की कोशिश जोर-शोर से शुरू कर दी गई है। इससे साफ है कि बड़े पैमाने पर राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग होंगी। 

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