दिहाड़ी मज़दूर बन गए करोड़पति प्राइवेट स्कूल

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जमशेदपुर, 10 जून : झारखंड सरकार के शिक्षा मंत्री जगन्नाथ महतो के सामने राज्य के करोड़पति प्राइवेट स्कूल प्रबंधन ने दैनिक वेतन भोगी मज़दूर के सामान लाचार होनेे का एक्टिंग किया। स्कूल प्रबंधन ने दैनिक मज़दूर के सामान कहा कि वे कमाएंगे नहीं तो खाएंगे कैसे? मसलन अगर वे लॉक डाउन के समय की फीस विद्यार्थियों से नहीं वसूलेंगे तो टीचरोंं को वेतन कहांं से देंगे। स्कूलों के इस तर्क का झारखंड केे शिक्षा मंत्री पर  असर हुआ  और उन्होंने 3 महीने में से 2 महीने की ट्यूशन फीस स्कूलों को वसूलने का अधिकार दे दिया। जबकि बहत से अभिभावक ऐसे हैं जो महीने भर काम करेंगे तो महीने भर खाएंगे। वैसे अभिभावकों का वेतन 3 महीन से बंद है या आधा मिल रहा है। छोटे और मध्यम वर्गीय व्यापारी की कमाई तो पूरी तरह 3 महीने से बंद है। वे अपनी बचाई गई कमाई 3 महीने से खा रहेे हैं और कर्मचारियों का वेतन भी दे रहे हैं। क्या प्राइवेट स्कूल अपनी बचाई गई पूंजी, जो करोड़ों रुपयों में है, से 3 महीने तक टीचरों का वेतन नहीं दे सकते? शिक्षा मंत्री के सामने प्राइवेट स्कूलों ने अपनी उदारता दिखाते हुए कहा कि वे 3 महीने तक स्कूल बस का भाड़ा अभिभावकोंं से नहीं लेंगे। जब उन्होंने 3 महीने से विद्यार्थियों को बस में बैठाया ही नहीं तो भाड़ा लेने का हक उनका कैसे हो गया? और यह भाड़ा छोड़कर वे दयालु कैसे बन गए? जानकार लोगों का कहना है कि स्कूल के व्यापार में बहुत ज्यादा प्रॉफिट है। पूर्व में स्कूल प्रबंधन स्कूल से कमाए गए प्रॉफिट को दूसरे व्यापार में लगाकर अरबपति हो गए थे। तब सरकार ने यह नियम बनाया कि स्कूल से कमाए गए प्रॉफिट को दूसरे व्यापार में नहीं लगाया जा सकता। फिर भी चोरी छुपे अनेक स्कूल, स्कूल से कमाए गए प्रॉफिट को दूसरे व्यापार में लगा रहे हैं। और जो स्कूल ऐसा नहीं करते वे अरबपति बने हुए हैं। महामारी के इस दौर में वे बिना कमाए टीचरों को वेतन क्यों नहीं दे सकते? इस महामारी के दौर में भी वे कमाएंगे तभी खाएंगे का सिद्धांत अपनाए हुए हैं।

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