अपनी पीठ खुद थपथपाने की भी हद होती है

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दिल्ली से संजय कुमार सिंह

कोरोना से लड़ाई और उससे निपटने के तरीकों की पोल खुलने के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय ने दो दिन पहले यह ट्वीट किया जिसमें दावा किया गया है कि 2014 के बाद देश के बच्चे-बच्चे में पर्सनल और सोशल हाइजीन को लेकर जो चेतना पैदा हुई है, उसका बहुत बड़ा लाभ कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में भी हमें मिल रहा है। 


मुझे नहीं पता वह लाभ क्या है और किस रूप में मिल रहा है। पर मान लेता हूं कि वह कोई लाभ होगा जो हमें नहीं दिख रहा है उसे सिर्फ माननीय प्रधानमंत्री देख पा रहे हैं। और इसीलिए उन्होंने लिखा है, आप ज़रा कल्पना कीजिए, अगर कोरोना जैसी महामारी 2014 से पहले आती तो क्या स्थिति होती? 

जब बात कल्पना करने की थी तो मुझे लगा कि प्रधानमंत्री जी को पता नहीं होगा कि उनके मंत्रिमंडल के नंबर दो और एक दूसरे सहयोगी, जो पापड़ से इम्युनिटी बढ़वा रहे थे, कोरोना से ग्रस्त होकर एम्स में पड़े हैं। पार्टी के और भी कई लोग संक्रमित हुए ठीक हुए और गुजर भी गए। इसमें फायदा क्या है राम जाने, फिर भी यह तथ्य है कि लाखों लोग अभी भी संक्रमित हैं। अगर बच्चों में चेतना जागृत होने के बावजूद केंद्रीय मंत्री तक संक्रमित हो जा रहे हैं तो आम आदमी की क्या पूछ? संक्रमितों की संख्या लाखों में है तो यह कहना कि कम है, का कोई मतलब नहीं है। 


पता चला कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी संक्रमित हो गए हैं। क्या पीएम के ट्वीट का यह अर्थ निकाला जाए कि उनमें चेतना की कमी थी इसलिए संक्रमित हो गए? चेतना के बावजूद संक्रमित हो गए तो 2014 के बाद बच्चों में आई चेतना का क्या फायदासरकार ने सोशल डिसटेंसिंग से लेकर मास्क तक का नियम बना रखा है पर कोरोना फैल ही रहा है। सरकार उसपर नहीं बोल रही है। कोई नहीं पूछ रहा है कि जब कोरोना फैल ही रहा है, मास्क लगाने पर भी व्यक्ति संक्रमित हो जा रहा है तो मास्क लगाने की मजबूरी क्यों? खासकर तब जब मास्क लगाने के कारण भी लोग मर गए। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री कार्यालय का यह दावा क्या प्रधानमंत्री की फजीहत कराने के लिए किया गया है?

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