अस्पतालों के सिस्टम को ठीक करें हेमंत सोरेन

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कवि कुमार
जमशेदपुर, 22 अगस्त
: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को कोई पीड़ित रोगी अगर ट्वीट करता है कि उसके इलाज में परेशानी हो रही है, अस्पताल सही ढंग से इलाज नहीं कर रहा है, उसे दवा नहीं मिल रही है वगैरह वगैरह। तब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ट्वीट करके जिला के उपायुक्त को सूचना देते हैं और उपायुक्त उस शिकायतकर्ता को राहत हो पहुंचाते हैं। मुख्यमंत्री ट्वीट करने वाले का भला तो कर देते हैं परंतु हजारों मरीज जो ट्वीट करना नहीं जानते या जिनके पास एंड्राइड मोबाइल नहीं है, वे मुख्यमंत्री से राहत नहीं पा सकते।

यह बात साधारण आदमी भी जानता है कि गांव या शहर में कितने पर्सेंट लोग एंड्राइड मोबाइल रखते हैं और उनमें से कितने पर्सेंट लोग ट्वीट करना जानते हैं।ऐसा भी नहीं कि हेमंत सोरेन सभी पीड़ितों के ट्वीट पर कार्रवाई करते हैं। पिछले सप्ताह खरसावां प्रखंड की एक विधवा आदिवासी महिला के इकलौते बेटे (13) को जमशेदपुर स्थित एमजीएमसीएच में उचित इलाज नहीं मिला। उसे एमजीएमसीएच से डिस्चार्ज कर दिया गया। गरीब मां उसे बड़े अस्पताल नहीं ले जा सकी। 14 अगस्त को मर वह गया। इस संबंध में अखबार द्वारा 13 अगस्त को किए गए ट्वीट पर हेमंत सोरेन ने कोई कार्यवाही नहीं की,बहरहाल। लोगों का मानना है कि हेमंत सोरेन की ‘ट्वीट कार्रवाईस से एक व्यक्ति को राहत मिलती है। जबकि मुख्यमंत्री को सिस्टम को सुधार कर बिना ट्वीट लाखों लोगों को राहत देने का काम करना चाहिए। जिस अस्पताल के मरीज ने उन्हें ट्वीट किया सिर्फ उस मरीज का भला न कर उस अस्पताल की व्यवस्था इस तरह करनी चाहिए, जिससे किसी दूसरे रोगी को उन्हें ट्वीट करने की जरूरत ही न पड़े। अगर रोगी गांव में बिना इलाज पड़ा है और हेमंत सोरेन को ट्वीट करता है तो उन्हें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि गांव के हेल्थ सेंटर या प्राइमरी हेल्थ सेंटर इस तरह के बीमार रोगियों का सर्वे कर खुद ब खुद उन्हें अच्छे अस्पताल में पहुंचाए। अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस तो पहले से ही उपलब्ध है। 

आज मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जमशेदपुर के मेहरबाई कैंसर अस्पताल के एक मरीज के ट्वीट पर उसे राहत देने के लिए उपायुक्त पूर्वी सिंहभूम सूरज कुमार को ट्वीट किया। सूरज कुमार ने तुरंत उसे राहत पहुंचाई परंतु इससे एमटीएमएच जैसे बड़े  कैंसर अस्पताल की व्यवस्था में सुधार नहीं आया। यह सभी जानते हैं कि यहां बाहर से आने वाले मरीजों को काफी परेशान किया जाता है। उन्हें एडमिट कर लिया जाता है परंतु कई दिनों तक किमो देने के लिए इंतजार कराया जाता है। इस दौरान मरीज का बेड चार्ज बढ़ता जाता है। ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों उदाहरण हैं। इस अस्पताल को मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी योजना के तहत  पंजीकृत किया गया है  परंतु  सिविल सर्जन द्वारा चेक मिल जाने के बाद  अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टर मरीज से ऐसा व्यवहार करते हैं जिससे मरीज अस्पताल से भाग जाता है तथा दूसरे अस्पतालों में अपना इलाज करता है। मुख्यमंत्री ने आज कैंसर के सिर्फ एक रोगी को राहत दी है। अगर मुख्यमंत्री एमटीएमएच की व्यवस्था में सुधार कर देते तो एक साथ हजारों रोगियों को राहत मिलती। भले ही उन रोगियों के पास एंड्राइड मोबाइल हो या न हो या उन्हें ट्वीट करना आता हो या न आता हो। जानकारों का मानना है अगर मुख्यमंत्री एक-एक रोगियों के दुख दूर करते रहेंगे तो उन्हें कई जन्म लेने पड़ेंगे, फिर भी रोगियों के दुख दूर नहीं होंगे।

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