कोरोना काल में एक बेटी की आपबीती

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प्रोफेसर शीतल पांडेय

शहर के लोकल न्यूज़ पेपर में रोज कोरोना से जुड़ी खबरें पढ़ कर रूह कांप जाती थी। शहर के एकमात्र सुप्रसिद्ध निजी अस्पताल की दुर्व्यवस्था, लापरवाही और मनमाने व्यवहार से जुड़ी खबरें रोज ही दृष्टिगोचर हो जाती हैंं। यहाँ मुझे नाम बताने की जरूरत नहीं कि मेरा इशारा किस निजी अस्पताल की ओर है…. जी हाँ आपने सही समझा… हम शहरवासी इलाज के लिए तो बस इसी अस्पताल की ओर ही टकटकी लगाए रहते हैं। कारण हमारे पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है… जरा सोचिये क्या अपने प्रियजनों को इलाज के लिए हम कभी सरकारी अस्पताल एमजीएम लेकर जाते हैं? कदापि नहीं। एमजीएम के प्रति मैं भी आपकी तरह नकारात्मक भावनाओं से भरी हुई हूं…।

लेकिन मेरे साथ घटित एक घटना ने एमजीएम के प्रति मेरे नज़रिये को बदल कर रख दिया। मैं नतमस्तक हूँ एमजीएम के प्रति।जी हाँ, आज कोरोना काल में मरीजों की देखभाल में शहर के सरकारी अस्पताल जो जिम्मेदारी उठा रहे हैंं… उसपर आप सबों का ध्यान खींचना चाहती हूँ। सबकुछ अपनी आँखों से देखा और अनुभव किया। आज मेरे पापा को गये 16 दिन हो गये। वो कोरोना पॉजिटिव थे। एकदिन अचानक उन्हें सांस लेने में तकलीफ हुई और मैं उन्हें लेकर शहर के उसी निजी अस्पताल में लेकर गई। पापा को तुरंत चिकित्सा की जरूरत थी। मैंने हाथ-पैर जोड़ा…. पर उस अस्पताल ने उन्हें एडमिट लेने से इंकार कर दिया। वजह नो बेड.. । एक 80 वर्षीय मरीज की तड़प भी उनकी सोई हुई मानवता को जागा नहीं पाई। वो तड़प रहे थे और उनको एडमिट करवाने के लिए मैं सारी पैरवी लगा रही थी।

एक घंटे के जद्दोजहद के बाद हारकर बेमन से उन्हें लेकर एमजीएम आई। मेरे एक फोन पर पापा को रिसीव करने के लिए वहाँ कर्मचारी तैयार थे। उनका बेड और ऑक्सीजन उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। बिना किसी कागजी कार्यवाही की औपचारिकता निभाए उन्हें सबसे पहले चिकित्सा दी गई। तब मुझे उनका पेपर बनाने के लिए भेजा गया। यहाँ कोरोना मरीजों के इंतज़ाम, जो मैंने देखा, वो मेरी कल्पना से परे था। कोरोना मरीज़ की देखभाल के लिए घर का अटेंडर एलाव किया गया था। सोचिये निजी अस्पताल में मरीज को आइसोलेट कर जहाँ आधा मार दिया जाता है वहां एमजीएम मेंं इस भयानक बीमारी मेंं अपनों से जोड़ कर बीमारी को आधा ख़त्म कर दिया जाता है। मरीज घर का खाना खा सकता है। डॉक्टर जब राउंड पर आते हैंं तो मास्क लगा कर.. मरीजों की नब्ज़ को खुद जाँचते हैं। उनका हौसला बढ़ाते हैंं… ।

निजी अस्पताल और एमजीएम की व्यवस्था की स्वयं तुलना करते जाइये। ये एमजीएम की सुन्दर व्यवस्था थी कि मेरे पापा जो बेहद क्रिटिकल थे, वो 15 दिन तक जचझारू योद्धा बनकर कोरोना से लडते रहे और कोरोना फाइटर बने….। उनकी जिद्द थी कि जबतक नेगेटिव नहीं हो जाता घर नहीं जाऊँगा। उन्होंने कोरोना को हरा दिया पर हार्ट फ़ैल से फेल हो गये। हमें संतोष इस बात का है कि 80 साल के इस अत्यंत क्रिटिकल मरीज़ के बचने की उम्मीद न थी पर वो घर आ सके और हमें अपनी अर्थी को कन्धा देने का सौभाग्य प्रदान कर सके… और ये संभव हो सका क्योंकि वो शायद शहर के उस निजी अस्पताल में नहीं थे बल्कि एमजीएम में थे। जहाँ उनके बेटे उनके साथ थे। जो उन्हें घर का खाना खिलाते थे… उनकी सेवा कर उनका मनोबल बढ़ाते थे…।

ऐसी बीमारी में अपनों का साथ बीमारी से लड़ने की ताकत देता है और अपनों से काट कर अलग करने से बीमारी से लड़ने की ताकत भला बुजुर्गो को कहा से आएगी, जो खुद से उठकर बैठ भी नहीं सकते। एमजीएम की इस सुन्दर व्यवस्था के लिए मैं स्वास्थ्य मंत्री की भूरी-भूरी प्रशंसा करती हूँ। जिन्होंने इस महामारी में एमजीएम में मानवता को सर्वोपरि रखा है। सर मैं नतमस्तक हूँ कि इस महामारी में आपने एमजीएम का वो ताना बाना बुना कि मरीज़ ठीक होकर घर जा रहे हैंं। एमजीएम के अधीक्षक स्वतः कॉविड वार्ड में जाकर मरीजों का हाल चाल लेते हैं। श्री राजेश बहादुर हर संभव सहायता के लिए तत्पर रहते हैंं।मेरा स्वास्थ्य मंत्री जी से अनुरोध है कि एमजीएम को दिल्ली ऐम्स की तरह बना दें। आप ही ऐसा कर सकते हैं…। हम शहरवासी आपसे गुहार लगाते हैंं। मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि जमशेदपुर की जनता आपको हर संभव सहयोग देने के लिए तत्पर रहेगी…। मैं सपरिवार एमजीएम के प्रति ताउम्र  अहसानमंद रहूंगी। शक्रिया… बहुत बहुत शुक्रिया…। एमजीएम की जय हो.एमजीएम की ये सेवा गदगद कर देती है

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