जमशेदपुर को हो रहा रोजाना पौने तीन करोड़ रुपए का नुकसान, देश का नंबर वन शहर बन जाता जमशेदपुर

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कविकुमार 

जमशेदपुर, 18 सितंबर : जमशेदपुर में नगर निगम बनाम औद्योगिक नगर का मामला इन दिनों चर्चा में है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जवाहर लाल शर्मा द्वारा सन 1988 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका के रूप में उठाया गया था। सन 1989 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय देते हुए जमशेदपुर में नगर निगम बनाने के पक्ष में फैसला सुनाया था। तत्कालीन बिहार सरकार के मुख्यमंत्री ने  टिस्को का पक्ष लेते हुए जब नोटिफिकेशन जारी नहीं किया तो कोर्ट की अवमानना का मुकदमा याचिकाकर्ता जवाहर लाल शर्मा द्वारा दायर किया गया।

तब कहीं जाकर नगर निगम बनाने के लिए सरकार ने मजबूर होकर नोटिफिकेशन जारी किया। नोटिफिकेशन जारी होते ही टाटा स्टील द्वारा पूरे शहर में इसके खिलाफ जन आंदोलन शुरू करवा दिया गया। शहर के चौक चौराहों पर सरकारी नोटिफिकेशन के खिलाफ बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए। एक बार भारी संख्या में महिलाओं द्वारा जुलूस निकलवाया गया। विभिन्न धार्मिक संगठनों द्वारा विष्टुपुर मेन रोड के सामने टेंट लगाकर धरना दिया गया। शहर में नुक्कड़ नाटक कराया गया, पर्चा पंपलेट बांटा गया तथा टाटा कंपनी द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाले विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, खेलकूद संगठनों के सहयोग से प्रचार का काम किया गया।

इसके साथ ही पूरे शहर में नगर निगम के विरोध में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया। एक दिन टाटा कंपनी के अफसरों और मान्यता प्राप्त मज़दूर यूनियन इंटक के अधिकारियों का जुलूस भी निकाला गया। टाटा स्टील के तब के डेपुटी मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जेजे ईरानी ने सर्किट हाउस गोल चक्कर पर धरना दिया। टाटा कंपनी के चेयरमैन सह मैनेजिंग डायरेक्टर रूसी मोदी ने अपने घर के सामने एक जनसभा कर सरकार को गंभीर चेतावनी भी दी। एक दिन करीब एक लाख लोगों का जुलूस बारी मैदान से लेकर तत्कालीन उपायुक्त के घर तक निकाला गया। देश विदेश के बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधियों को जमशेदपुर बुलाकर लेख लिखवाया गया।। न्यूयार्क टाइम्स के एक रिपोर्टर ने भी याचिकाकर्ता से बातचीत करके न्यूज छापी। शहर में एक विचित्र माहौल बनाया गया। मानो सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शहर पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा पर लोगों को मिलने वाली जन सुविधा तथा संवैधानिक लाभ खासकर तीसरे मताधिकार की बात को पूरी तरह से छिपा दिया गया। बात यहीं तक नहीं रही।

टाटा स्टील ने जो कथित जन आंदोलन चलाया इसके एवज में उसे अंतरराष्ट्रीय गोल्डन ग्लोब अवार्ड भी मिला। जवाहर लाल शर्मा ने बताया कि आज 32 वर्षों के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हुआ और न ही शहर का चहुँमुखी विकास ही हुआ। आज भी  जमशेदपुर देश में विकसित शहरों की सूची में काफी नीचे है। कोरोनाकाल मेंं शहर के लोगों की कंपनी के अस्पतालों में जो दुर्गति हुई है इसे भुलाया नहीं जा सकता है। कई लोग बिना बेड, बिना वेंटीलेटर के मरे हैं। यह अत्यंत दर्दनाक है। अब तक की सारी राजनीतिक पार्टियों की सरकारें तथा टाटा स्टील पूरे मामले में उदासीन रही है। अभी एक बात सामने आ रही है कि अगर जमशेदपुर में नगर निगम होता तो यहांँ कम से कम 1000 करोड़ रुपए का अनुदान केंद्र सरकार से आता और अगर स्मार्ट सिटी परियोजना में रहता, जो कि जमशेदपुर वास्तव में था, तो जमशेदपुर को विकास के लिए और कई हजार करोड़ रुपए मिलते।

अगर हम मात्र 1000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष ही मान लें तो ये रुपए न मिलने की वजह से शहर को प्रतिदिन लगभग पौने तीन करोड़ रुपए का नुकसान होता रहा है। ये नुकसान पिछले कई वर्षों से हो रहा है। आप अंदाजा लगा लीजिए कि जिस शहर को रोज पौने तीन करोड़ रुपयों का नुकसान उठाना पड़ रहा हो, अगर नगर  निगम बन गया होता और इतना रुपया मिल रहा होता तो शहर की काया ही पलट गई होती। टाटा कंपनी लीज समझौते के तहत जो खर्च करती है, उसका हिसाब सार्वजनिक नहीं है। फिर भी टाटा कंपनी जमशेदपुर शहर पर जितना खर्च कर रही है वह अतिरिक्त खर्च होता ही रहता। सरकारी और टाटा कंपनी दोनों की रकम मिलकर काफी बड़ी रकम हो जाती। ऐसे में इतनी बड़ी रकम से जमशेदपुर देश का नंबर वन शहर बन जाता।

जवाहर लाल शर्मा ने जमशेदपुर की जनता से सवाल किया है कि क्या आम जनता अब भी गुमराह रहेगी? क्या जनता को आगे आकर अपना संवैधानिक अधिकार नहीं लेना चाहिए?विभिन्न अदालतों से होता हुआ मामलापुन: सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया है। आशा है सरकार जल्द फैसला करवाने काप्रयास करेगी।

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