तानाशाह सिर्फ सरकार नहीं होती, सेक्यूलर भक्त भी होते हैं

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दयानंद पांडेय 
सेक्यूलर भक्त बहुत ढीठ और बहुत बेशर्म होते हैं। तानाशाह सिर्फ सरकार नहीं होती, सेक्यूलर भक्त भी होते हैं। सेक्यूलर भक्त फासिस्ट भी होते हैं। चुनी हुई चुप्पियों, चुने हुए विरोध के कायल होते हैं। हर हाल में अपने राजा का बाजा बजाने में माहिर होते हैं। 

ताज़ा वाकया राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश का है। हरिवंश जब तक चंद्रशेखर के साथ थे बहुत भले थे। प्रभात खबर में संपादक थे तब भी भले थे। विद्वान संपादक कहे जाते रहे। नीतीश कुमार के साथ थे तब भी भले थे। राज्य सभा में अशोक वाजपेयी की दावेदारी को कुचलते हुए हरिवंश को नीतीश कुमार ने राज्य सभा भेज दिया। तब भी सब कुछ ठीक था। कुछ लोग तब भी बिदके थे। लेकिन उनकी नोटिस नहीं ली गई। हरिवंश सदाशयता की मूर्ति बने रहे। लेकिन ज्यों नीतीश कुमार ने महाजातिवादी, महाभ्रष्ट और अराजक लालू प्रसाद से पिंड छुड़ाया, नीतीश कुमार, इन भक्त सेक्यूलर की नज़र से गिर गए। महापापी, महाअधम हो गए नीतीश कुमार। और यह देखिए कि नीतीश से जुड़े हरिवंश ज्यों ही राज्य सभा के उप सभापति बने तो इन सेक्यूलर भक्तों की नज़र में तुरंत सांप्रदायिक घोषित हो गए। राजपूत घोषित हो गए। अवसरवादी घोषित हो गए।

अब जब उनको दूसरा कार्यकाल मिल गया तो इन सेक्यूलर भक्तों की जैसे जान निकल गई। फिर वही सारे आरोप दुहराए गए। अदभुत है यह भी। हरिवंश फिर भी मुस्कुराते हुए निकल गए। लेकिन अभी जब कृषि बिल पास हुआ तो इन सेक्यूलर भक्तों ने सारा ठीकरा एक बार फिर से हरिवंश पर फोड़ दिया है। गुड है। हरिवंश की यह सदाशयता ही है कि कल जिन सांसदों ने उन के साथ अभद्रता की, उनके लिए धरना स्थल पर अपने घर से चाय ले कर गए। पर इन सांसदों को उन का यह शिष्टाचार नहीं भाया और चाय नहीं पी। हरिवंश खुद उपवास पर बैठ गए। इससे भी सेक्यूलर भक्त लोग बिदक गए। उन्हें किसान विरोधी बताने के लिए गाल बजाने लगे। 

इन सेक्यूलर्स भक्तों का दावा है कि भाजपा के पास राज्य सभा में बहुमत नहीं था, फिर भी हरिवंश ने ध्वनि मत से कृषि बिल पास करवा दिया। बिलकुल ठीक बात है। लेकिन हुजूरे आला अगर बहुमत नहीं था भाजपा के पास तो यह सिद्ध करने के लिए आप सबको अपनी-अपनी सीट पर बैठ कर वोटिंग करनी थी, बिल अपने आप गिर जाता। पर नहीं पहले तो आप सेक्यूलर भक्तों ने इस बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की बात की। अमूमन विपक्ष द्वारा यह सेलेक्ट कमेटी में किसी बिल को भेजने की मांग वैसे ही होती है जैसे किसी अदालत में हारने वाला पक्ष येन-केन-प्रकारेण तारीख पर तारीख ले कर मामला लटकाता रहता है। याद कीजिए राम मंदिर वाला मुकदमा। तो जब सेलेक्ट कमेटी को मामला नहीं गया तो आप वोट देने के बजाय हंगामा करने पर, उप सभापति का माइक तोड़ने पर, रूल बुक फाड़ने पर आ गए। काहे भाई, काहे? तब जब, आप के मुताबिक़ राज्य सभा में बहुमत आप के पास था। 

खैर सेक्यूलर भक्तों यह बताइए कि जब तीन तलाक, 370 और सीएए का मामला आया तो क्या तब भाजपा के पास राज्य सभा में बहुमत था? जाहिर है कि नहीं था। तब फिर कैसे पास हो गया यह सब? आप के बीच बैठे गद्दारों ने ही तो पास करवाया। यह भी नहीं जानते? नहीं जानते तो आसान शब्दों में बताता हूं। लोक सभा, राज्य सभा या किसी भी सभा में दो तरह का बहुमत होता है। एक संख्या बल का बहुमत दूसरे, जुगाड़ का बहुमत। भारतीय लोकतंत्र को यह जुगाड़ का बहुमत सिखाया है कांग्रेस ने। सब जानते हैं कि नरसिंहा राव सरकार के पास कभी पूर्ण बहुमत नहीं था। लेकिन बड़े ठाट से उन्होंने पूरे पांच बरस सरकार चलाई। तब इन सेक्यूलर भक्तों ने एक बार भी मुंह नहीं खोला। जैसे मुंह में दही जमी हुई थी। तो खुला खेल है कि इस कृषि बिल पर भी भाजपा के पास यही जुगाड़ वाला बहुमत था। जैसे तीन तलाक, 370 और सीएए के समय था। इसलिए विपक्ष बौखला कर राज्य सभा में हिंसा पर उतर आया। मार्शल का गला तक दबा दिया। सोचिए कि वही मार्शल ने पलट कर इस गुंडे संजय सिंह को दबोच लिए होता तब? अरविंद केजरीवाल के कच्छे धोते हुए राज्य सभा में दाखिल होने वाला यह संजय सिंह क्या करता?

अच्छा नीतीश कुमार और हरिवंश, मोदी और भाजपा के साथ खड़े हो गए तो बहुत बड़े अपराधी और पापी हो गए। गुड बात है। मान लिया। लेकिन जब सोनिया कांग्रेस कभी मुस्लिम लीग से हाथ मिलाती है केरल में, तब? महाराष्ट्र में शिव सेना का बगल बच्चा बन कर सरकार में साझेदार बन जाती है तब? यह सेक्यूलर भक्त फौरन गांधी के बंदर बन जाते हैं। न कुछ देखते हैं, न सुनते हैं, न बोलते हैं। यह क्या है? अच्छा सत्ता की साझेदारी का सवाल है। चलिए माना। यह भी गुड है। पर जब सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु का विवाद सामने आता है तब भी यह सेक्यूलर भक्त खामोश रहते हैं। गुड है यह भी। कंगना रानावत का मामला आता है तब भी गांधी के बंदर बन जाते हैं यह सेक्यूलर भक्त।

यह क्या है सेक्यूलर भक्तों? एमजे अकबर का मी टू , मी टू है पर विनोद दुआ का मी टू , माई टू कैसे बन जाता हैं सेक्यूलर भक्तों? और अनुराग कश्यप का मी टू तो जैसे सेक्यूलर भक्तों को लकवाग्रस्त कर देता है। पायल घोष पर यह सेक्यूलर ब्रिगेड कब हमलावर होती है, देखना है। कम से कम स्वरा भास्कर जैसों को तो सामने आना चाहिए। रिया चक्रवर्ती से पैसा ले कर राजदीप सरदेसाई जैसा सेक्यूलर उस का इंटरव्यू लेता है, उस के बचाव में। बचा नहीं पाता, यह अलग बात है। उलटे आज तक की टीआरपी गोता मार जाती है। इस एक रिया चक्रवर्ती के इंटरव्यू से। आज तक अभी भी इस डूबती टीआरपी को संभाल नहीं पाया है। तमाम कोशिशों के बावजूद।  अब दीपिका पादुकोण ड्रग में फंसी है। जाएगा कोई सेक्यूलर भक्त दीपिका का भी इंटरव्यू लेने? बताएगी दीपिका कि उसे भी रात में सपना आया, इस लिए बोल रही है। आखिर यह वही दीपिका पादुकोण है जो सीएए के विरोध में दिल्ली दंगों के दौरान जेएनयू जा कर चुपचाप दंगाइयों के समर्थन में खड़ी हो गई थी, अपनी छपाक जैसी अच्छी फिल्म का भी व्यावसायिक सत्यानाश कर लिया। अब कितने जेएनयू वाले सेक्यूलर भक्त दीपिका पादुकोण के साथ खड़े होते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। अब तो कुछ सेक्यूलर भक्त कह रहे हैं कि दीपिका चूंकि जेएनयू गई थी, इस लिए उसे फंसाया जा रहा है। गोया वाट्सअप चैट भी दीपिका का सरकार में बैठे लोगों ने दीपिका से करवाया। दिया मिर्जा, नम्रता शिरोडकर, करिश्मा जैसों का चैट भी मैनेज किया सरकार ने?

जो भी हो सेक्यूलर भक्तों की महिमा अपरंपार है। इन लोगों ने भाजपाइयों और संघियों को भक्त कह-कह कर घृणा और नफ़रत की ऐसी जहरीली खेती की कि जनता के बीच पूरी तरह नंगे हो गए हैं। आप यह तथ्य खुद देखिए कि यह सेक्यूलर भक्त अपने ही जहर की खेती में भस्म हो कर, हर किसी असहमत को संघी, भाजपाई बताते रहे। और देश की जनता ने सभी सर्वोच्च पदों पर इन्हीं संघियों और भाजपाइयों को बैठा दिया है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, लोकसभा अध्यक्ष जैसे शीर्ष पदों पर तो यह संघी हैं ही। इस के अलावा 18 मुख्य मंत्री, 29 राज्यपाल हैं। ऐसे जाने कितने विवरण हैं। तो क्या सारा देश संघी हो गया है? सेक्यूलर भक्तों, अभी समय है कि लोकतंत्र में यक़ीन करना सीखिए। अपनी चुनी हुई चुप्पियों, चुने हुए विरोध से बाहर निकल कर नफरत और जहर की खेती बंद कर देश की मुख्य धारा में लौटिए। सेक्यूलरिज्म का जहर बांटना बंद कीजिए। बात-बेबात आज़ादी मांगने वाले इन सेक्यूलर भक्तों को अब अपनी इस हिप्पोक्रेसी से आज़ादी मांग लेनी चाहिए। 

कभी तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा, जैसे नारे, हिंदू , मुसलमान करना, जब मन तब सुप्रीम कोर्ट को निशाने पर ले लेना, सेना को बलात्कारी बता देना, कभी चुनाव आयोग को भाजपा आयोग बताना, कभी सी बी आई पर हमला, राफेल का वितंडा खड़ा करना, कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ खड़े हो जाना, कोरोना काल में भी मज़दूरों को भड़काना, अपनी ही मां को रंडी बताना और अब लोक सभा, राज्य सभा को भी अपनी नफरत और जहर की लपट में ले लेना। ऐसे कुकर्मों से बचिए सेक्यूलर भक्तों। यह गुड बात नहीं। सेक्यूलर भक्त इसीलिए अब देश की जनता के निशाने पर हैं। लेकिन सेक्यूलर भक्तों की आंख और दिमाग पर नफरत और जहर की पट्टी बंधी हुई है। कुछ दीखता ही नहीं, उन्हें अपने अहंकार के सामने। यह जहरीली पट्टी आंख और दिमाग से जब तक सेक्यूलर भक्त नहीं उतारेंगे तब तक न खुद चैन से रहेंगे, न देश को चैन से रहने देंगे। 

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