टाटा और डीवीसी पर कैग की रिपोर्ट की उपेक्षा क्यों?

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शहर के जानेमाने चिंतक केके सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई हजार करोड़ रुपए सरकारी राजस्व के घोटाले की जानकारी दी है। यह जानकारी कई राजनेताओं और उद्योगपतियों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। पत्र में केके सिन्हा ने लिखा है वे कि झारखंड राज्य सरकार, टाटा स्टील और डीवीसी के बीच विवादित मुद्दे के कुछ बिंदुओं को उजागर कर रहे हैं। जिसमें राज्य के काॅम्पट्रोलर एंड आडीटर जेनरल आफ इंडिया (कैग) ने 11,676 करोड़ रुपये की सरकारी खजाने के नुकसान का पता लगाया था।

कैग ने रहस्योद्घाटन किया था कि टाटा स्टील और डीवीसी दोनों ने राज्य सरकार को विश्वास में लिए बिना विशिष्ट व्यक्तियों और उद्योगों को भूमि देने में कानूनी मानदंडों की घोर अवहेलना की और राज्य सरकार को भारी नुकसान पहुँचाया। कैग ने अपनी रिपोर्ट में, कहा था कि अनियमितताओं को डिप्टी कलेक्टर, टाटा लीज ने जानबूझकर किया था। साथ ही भूमि सुधार विभाग के सचिव को इसके बारे में पूरी जानकारी थी। सीएजी की यह रिपोर्ट झारखंड विधानसभा में पेश की गई थी और विधानसभा ने इस रिपोर्ट में उठाई गई 99 प्रतिशत आपत्तियों को स्वीकार कर लिया था।

वास्तव में कैग विभिन्न अन्य संगठनों और अन्य तरीकों से अनियमितताओं के बारे में लगातार पगली घंटी बजाता है, जहां सरकारी खजाने को राजस्व की हानि होती है। परंतु राज्य सरकार द्वारा कैग के इस संकेत की उपेक्षा की गई, इसे दबाया गया, अनदेखा किया गया है। कई राज्य सरकारों द्वारा इस रहस्योद्घाटन को जानबूझकर टाल दिया गया। जिन राज्यों में सरकार करोड़ों खर्च करती है, उन राज्यों में कैग होना चाहिए? पर उसकी रिपोर्ट पर ध्यान नहीं दिया गया तो कैग का उपयोग क्या है?

टाटा स्टील के मामले में कैग ने 59 भूखंडों का पता लगाया था (उस अवधि तक) जो गैरकानूनी तरीके से व्यक्तियों को दिए गए थे। (वाणिज्यिक उद्देश्य पढ़ें) धार्मिक स्थानों और शैक्षणिक संस्थानों ने 4700 करोड़ रुपये का राजकोषीय नुकसान किया। टाटा स्टील ने यह कहते हुए खुद को सही ठहराने का प्रयास किया कि भूमि शैक्षिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों और आवासीय उद्देश्यों के लिए दी गई थी। उदाहरण के लिए, एक्सएलआरआई शैक्षणिक संस्थान को अनुदान क्यों दिया जाना चाहिए? क्या संस्थान ने झारखंड के छात्रों या जमशेदपुर के छात्रों के लिए कोई रियायत दी है? जिस संस्थान ने इस जमीन में एक विशाल होस्टल का निर्माण किया है और छात्रों से भारी शुल्क वसूलता है।

प्रधानमंत्री को बताया गया है कैग की रिपोर्ट आने के बाद रघुवर दास के अधीन राज्य सरकार ने 2017 में एक बार फिर राज्य को होने वाले नुकसान का आकलन करने और टाटा स्टील से ली जाने वाली राशि का सुझाव देने के लिए उपयुक्त मशीनरी समिति (एएमसी) की स्थापना की थी। जिस समिति में पूर्वी सिंहभूम के डीसी की अध्यक्षता में भूमि सुधार विभाग और टाटा स्टील का प्रतिनिधित्व था। तबके डीसी अमित कुमार ने सुझाव दिया कि भूमि की लागत का मूल्यांकन मौजूदा दर पर होना चाहिए और टाटा स्टील को राज्य को 1700 करोड़ रुपये का भुगतान करना चाहिए। यह रिपोर्ट राज्य को भेजी गई।

यहां यह उल्लेखनीय है कि रिपोर्ट में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि क्या एएमसी ने उक्त भूखंडों के स्थान और महत्व को समझने के लिए भूखंडों का कोई भौतिक सत्यापन किया था? इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि जमीन की दरें किसने तय की थीं? यदि मौजूदा दरों के अनुसार लागत 1700 करोड़ रुपये आई तो दरों को तय करने का आधार क्या था? अगर एएमसी को सरकारी खजाने को नुकसान हुआ तो वह 700 करोड़ का था। कैग की रपोर्ट का आधार क्या था और इसने 4700 करोड़ रुपये की राशि की गणना कैसे की?

एएमसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान दर पर सरकारी किराए पर मूल्यांकन किया गया है। कैग ने दो साल से अधिक समय पहले दरों की गणना की थी वह 2017 में सरकारी दर में कम कैसे हो सकती है? कौन गलती पर है। राज्य सरकार या कैग? यहां यह फिर से ध्यान दिया जाना चाहिए कि जब मामला सामने आया था तो विधानसभा ने कैग द्वारा उठाई गई 99 प्रतिशत आपत्तियों को स्वीकार कर लिया था

क्या विधानसभा ने भी डीवीसी से नुकसान की वसूली के लिए अलग से एएमसी का गठन किया था? अगर किया था तो डीवीसी के लिए एएमसी ने कितनी रकम के सरकारी राजस्व हानि की गणना की थी? सार्वजनिक रूप् से इन बातों का कोई उल्लेख नहीं है कि क्या डिफाॅल्टर्स टाटा स्टील और डीवीसी ने सरकार के खजाने में रुपया जमा किया है या नहीं? और अगर जमा किया है तो वास्तविक रकम क्या है?
केके सिन्हा ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि इस मुद्दे को सार्वजनिक करने के लिए राज्य सरकार को सुझाव दें। मेरा दूसरा अनुरोध कैग की उपयोगिता पर गंभीरता से विचार करने का है, यदि इसकी रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया जाना है तो उसे बनाए रखना उचित है या नहीं।

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