सीएसआर फंड का गलत इस्तेमाल, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरन को लिखा पत्र

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केके सिन्हा
जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने पूर्वी सिंगभूम के डीसी को पत्र लिखकर उनसे सीएसआर योजनाओं के तहत कंपनियों द्वारा किए जा रहे कार्यों का विवरण प्रस्तुत करने का अनुरोध किया है। उन्होंने सूचीबद्ध 16 कंपनियों के नाम दिए हैं। जिनमें ज्यादातर टाटा की हैं। सरयू राय का कहना है कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में दो दर्जन से अधिक कंपनियां हैं, लेकिन जब वे इस क्षेत्र का दौरा करते हैं तो उन्हें सीएसआर फंड से किया गया ऐसा कोई काम नहीं दिखाई देता है। यह एक बहुत ही गंभीर आरोप है। डीसी को इन कंपनियों द्वारा किए गए काम की सूची की मांग करनी चाहिए। सीएसआर राशि करोड़ों रुपये में है इसलिए इससे किए गए विकास कार्य नजर आने चाहिए।

मैंने इस विषय पर पिछली सरकार को लिखा था। मुख्य सचिव ने एक समिति का गठन भी किया। साथ ही नियमित आधार पर कंपनियों के साथ बैठक करने का निर्णय लिया गया। मैंने झारखंड में न केवल टाटा बल्कि सभी कंपनियों के बारे में बाते की थी। केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली कंपनियों की अपनी खदानें हैं। इसके अलावा कई अन्य कंपनियां भी राज्य में काम कर रही हैं।

इस संबंध में मैं अपने कुछ अनुभव साझा करना चाहूंगा। आधुनिक कंपनी की खानों में सीएसआर की ताजा गतिविधि जानने के लिए मैंने दौरा किया था। वहां सीएसआर के तहत पांच महिलाओं को साबुन का कवर बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। किरीबुरू जीएम श्री श्रीवास्तव ने जानकारी दी कि उनके लौह अयस्क खनन से दूषित हुई नदी की सफाई पर सीएसआर का ज्यादातर पैसा खर्च किया जा रहा है। जिंदल, आधुनिक और रूंगटा माइंस ने संयुक्त रूप से सीएसआर के रुपयों से गुआ में एक सड़क तैयार करने की योजना बनाई क्योंकि सभी कंपनियां अपने भारी वाहनों को यहां से ले जाती थीं। इस सड़क को बनने में 8 साल लगे। लोगों को अभी भी शिकायत है कि सीएसआर फंड से बनाई गई यह सड़क मानक से नीचे थी और बरसात के मौसम में उपयोग करने योग्य है।

टाटा स्टील ने बताया था कि सीएसआर पर वह अनिवार्य रकम से ज्यादा खर्च करती है। कंपनी सिंहभूम के तीन जिले में सीएसआर का पैसा खर्च करती है। हालांकि वे वर्षों से विकास के कामों को कर रहे हैं, पर शायद ही कोई ऐसा कोई गाँव है जिसे  विकसित कहा जा सके। शिकायत थी कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत टाटा स्टील द्वारा चलाए जा रहे मोबाइल मेडिकल वैन ने गाँवों में जाना बंद कर दिया था। विवादों के बाद वे टालमटोल करने लगे। बाद में सुविधा चालू की गई।

मैंने सुझाव दिया था कि सरकार इस बात का फैसला करे कि कौन से कार्य जरूरी हैं और कंपनियों से सरकार अपने निरीक्षण में सीएसआर की रकम खर्च करवाए. मैंने यह भी सुझाव दिया था कि कई संस्थान कंपनी अधिनियम के तहत नहीं आते हैं अतः उन पर सीएसआर की देनदारियां नहीं बनती है। लेकिन वे काफी पैसे कमा रहे हैं। क्या ऐसे संगठनों की सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में भूमिका नहीं होनी चाहिए?

राज्य को ऐसे संगठनों के लिए एक विधेयक लाना चाहिए। इनकी आय की सीमा तय की जानी चाहिए और ऐसे संगठनों की वास्तविक आय का आकलन करने के लिए उचित उपाय किया जाना चाहिए। एक्सएलआर व एक्सआईएसएस जैसे संस्थान, नर्सिंग होम, शाॅपिंग माॅल, कोचिंग संस्थान, बड़े होटल और रेस्तरां बड़े पैमाने पर मुनाफा कमाते हैं लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी में उनकी कोई भूमिका नहीं है। सच है कि वे कानून के अनुसार करों का भुगतान करते हैं। सीएसआर देने वाली कंपनियाँ भी तो करों का भुगतान करती हैं। यदि अन्य नियम काम नहीं आते हैं तो राज्य इनपर ‘कोरोना कर’ लगा सकता है।

ऐसी शिकायतें हैं कि कंपनियां सीएसआर की रकम में अपने अन्य व्यय को मिलाकर दिखाती हैं। राज्य को श्री राय के सुझाव का पालन करना चाहिए और सीएसआर फंड का उपयोग करने के तरीके के बारे में सभी डीसी से स्पष्ट व्योरा लेना चाहिए। इस संबंध में मैंने आज भारत के प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र भी लिखा है।

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