बिहार में एक भी मुस्लिम मंत्री नहीं, जदयू के सारे मुस्लिम प्रत्याशी हारे

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–सुरेंद्र किशोर–

‘लोग शिकायत कर रहे हैं कि आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार राज्य सरकार में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है। उन्हें मालूम होना चाहिए कि जदयू ने 11 मुस्लिम प्रत्याशी चुनाव में उतारे और ये सभी उम्मीदवार हार गए।   

असल प्रश्न यही है कि आखिर मुस्लिम सांप्रदायिक आधार पर मतदान क्यों करते हैं? इसके बजाय वे सत्तारूढ़ गठबंधन को जिता कर सत्ता में साझेदार क्यों नहीं बनते?’’—सानु संक्रांत, दैनिक जागरण, 22 नवंबर 2020       

अब जरा अधिसंख्य मुसलमान मतदाताओं की पहली पसंद तो देखिए! असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को बिहार में इस बार 5 विधान सभा सीटें मिलीं।यह ऐसी पार्टी है जिसके नेता अकबरूद्दीन ओवैसी सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि‘‘तुम सौ करोड़ हो न! हम बीस करोड़ हैं।15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो। फिर देखो कि हम कितने रह जाते हैं और तुम कितने?’’ इस मारक टिप्पणी पर जब बड़े ओवैसी से सवाल पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि मामला अदालत में है। मैं इस पर कुछ नहीं बोलूंगा। हालांकि राम मंदिर पर सबसे बड़ी अदालत का फैसला आ जाने के बाद भी टिप्पणी करने से खुद को वे रोक नहीं पाते।

नीतीश सरकार ने बिहार विधान सभा में पहले ही यह प्रस्ताव पारित करवा दिया था कि राज्य में एन.आर.सी. लागू नहीं होगा।पर अधिसंख्य मुस्लिम मतदाता उतने ही से संतुष्ट नहीं हैं।
अधिसंख्य मुस्लिम मतदाताओं ने इस बार ओवैसी के अलावा उन दलों को भी वोट दिए जो ‘सिमी’ के समर्थक रहे हैं। सिमी का नया रूप पी.एफ.आई. है। जिन्होंने जे.एन.यू. जाकर टुकड़े-टुकड़े गिरोह के साथ अपनी एकजुटता दिखाई थी।

जो दल शाहीन बाग गए जहां नारे लग रहे थे- ‘‘हमें जिन्ना वाली आज़ादी चाहिए।’’ उन्हें भी मुस्लिम वोट मिले जो दल पश्चिम बंगाल में करोड़ों बंगलादेशी घुसपैठियों को बुलाकर उन्हें मतदाता बनवाया।अब समझ में आया कि देश कहां जा रहा है ?!!इसके बावजूद अगले विस्तार में नीतीश कुमार किसी मुस्लिम को मंत्री बनाएंगे ही।क्योंकि राजग सबका साथ, सबका विकास चाहता है। भले सबका विश्वास मिले या नहीं।

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