अलविदा, मंगलेश जी

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संजय कुमार सिंह

बात बहुत पुरानी है। जनसत्ता के दिल्ली दफ्तर में हड़ताल थी और प्रबंधन ने तय किया कि चंडीगढ़ से दिल्ली के लिए हड़ताल अवधि के दौरान एक अलग साप्ताहिक अखबार निकाला जाए। जो लोग हड़ताल पर नहीं थे उन्हें चंडीगढ़ ले जाया गया।

उस समय मैं जनसत्ता में नया था और मंगलेश जी से औपचारिक परिचय ही था। उस समय तक मैं उन्हें साहित्यकार और कवि ही समझता था। सीनियर तो वो थे ही। पर चंडीगढ़ वाली टीम को लीड करने के लिए चुने गए थे और उन्होंने दो विशेष अंक भी खूब निकला था। अद्भुत, अद्वितीय और यादगार। जिसे बहुत कम लोग देख पाए थे। कारण आप समझ सकते हैं। विषय का चयन से लेकर पेज बनाने तक – सब मंगलेश जी के नेतृत्व में। शानदार। 

उसी समय पता चला था कि पीठ दर्द के कारण वे कमरे में पलंग की बजाय जमीन पर सोते थे। उस समय और बाद में कई मौकों पर उनकी भलमनसाहत ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। बाद में मैंंने जाना कि एक परिचित ने पांच सितारा होटल में कथित हार्ड बेड की मांग की तो पलंग पर पटरा रख दिया गया।  

मंगलेश जी जमीन पर ही सो जाते थे। उस एक यात्रा में मुझ  मंगलेश जी की ये दो खासियतें मालूम हुईं। उस विशेष परिस्थिति में जनसत्ता की संपादकीय टीम का नेतृत्व करने के लिए चुना जाना और निजी समस्या को निजी ही रखना। वरना उस गेस्ट हाउस वालों से गद्दा हटाने के लिए तो कहा ही जा सकता था।ऐसे मंगलेश जी को कोरोना लील गया। नमन, श्रद्धांजलि।

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