भागलपुर के लाल ने लॉकडाउन को बदल लिया अवसर में

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जमशेदपुर, 5 दिसंबर : वैश्विक महामारी के इस दौर ने जहां देश ही नहीं पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। लाखों को बेरोजगार कर दिया। इन सबके बीच बिहार के भागलपुर के एक युवक ने कोरोना महामारी काल को अवसर में बदलने की ठानी. आज युवक द्वारा कोरोना महामारी काल के दौरान शुरू किया गया संघर्ष फलीभूत हो रहा है. वहीं युवक के संघर्ष की चर्चा भागलपुर ही नहीं बिहार के अन्य जिलों के साथ झारखंड में भी हो रही है.

 बेहद ही साधारण सा दिखनेवाला यह युवक बिहार के भागलपुर जिले के सन्हौला प्रखंड के एक छोटे से गांव पोठिया का रहनेवाला है. जिसका नाम सुमित आनंद चौधरी है. लॉकडाउन से पहले सुुमित भागलपुर के एक निजी मोटर व्हीकल शोरूम में काम कर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा था. चार बीघा की पैतृक संपत्ति औऱ निजी कंपनी में नौकरी कर किसी तरह परिवार का गुजर बसर कर रहा था. सबकुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था. अचान वैश्विक महामारी कोरोना ने देश में अपना जाल फैलाया और देश के बाकी राज्यों के मजदूरों की तरह सुमित को भी अपनी नौकरी गंवानी पड़ी, और उसने भी वपिस अपने गांव का रूख किया. परिवार का बोझ और सीमित संसाधन के बीच उसे ये नहीं सूझ रहा था कि आखिर आगे की जिदगी कैसे कटेगी. सवर्ण जाति का होने के कारण उसे सरकारी सुविधाएं मिलनी तो दूर उसे किसी प्रकार का कोई आर्थिक सहयोग भी नहीं मिल रहा था. 

बतौर सुमित उसके पिता एक किसान हैं, चार बीघा पैतृक संपत्ति में उसके बड़े पिताजी की भी हिस्सेदारी बनती है, लेकिन वे चुंकि सरकारी नौकरी करते थे औऱ उसके दो चचेरे भाई भी बाहर ही सेटल हैं, लेकिन हमेशा से परिवार के हर सुख-दुःख में खड़ा होने के साथ आर्थिक मदद भी किया करते हैं. सेवानिवृत हो चुके बड़े पिताजी के कहने पर बड़े भैया (चचेरे भाई) ने दो बीघा जमीन गांव में ही खरीदा.

सुमित ने बताया कि वह नहीं चाहता था कि भैया भी पारंपरिक खेती करें. ऐसे में उसने अपने चचेरे भाई को सवा बीघा जमीन पर तालाब खुदवाकर मछली पालन करने की सलाह दी. लक्ष्य बड़ा था, पूंजी का अभाव, लेकिन बड़े भाई ने हामी भर दी. फिर क्या था सुमिन ने कोरोना महामारी के भीषण दौर यानी अप्रैल-मई के महीने में प्रचंड गर्मी औऱ कोरोना के कहर के बीच तालाब खुदाई में जुट गया और एक महीने के भीतर सवा बीघा के खेत में तालाब खुदवा कर मछली पालन के शुरू कर दिया.

देखते ही देखते सुमित के इस धंधे ने आज पारंपरिक खेती करनेवाले किसानों के सामने एक नजीर पेश कर दी. आज सुमित द्वारा पाले गए सीलन मछली लगभग एक से सवा टन के आसपास हो चुके हैं, जिसका उत्पादन शुरू हो चुका है. सुमित के अनुसार लागत से तीन गुणा मुनाफा होने का अनुमान है.

ग्रामीणों का भी मिला भरपूर सहयोग

सुमित ने बताया कि गांव में पहली बार पारंपरिक खेती का ट्रेंड शुरू किया जा रहा था, उसे लगा कि इतना बड़ा रिस्क लेने पर कहीं दांव उल्टा न पड़ जाए, लेकिन ग्रामीणों ने उसे हर कदम पर साथ दिया. रात-रात बर जगकर ग्रामीणों के साथ इस व्यवसाय को लेकर चर्चा करता था. ग्रामीण युवा उसे उत्साहित करते थे. उसके इस व्यवसाय से प्रभावित होकर दो चार औऱ युवा इस व्यवसाय में किस्मत आजमा रहे हैं. तीन-तीन छोटे-छोटे तालाब आज गांव में खुद चुके हैं और उसमें मछली पालन हो रहा है. सबसे बड़ी खुशी वैसे किसानों को हो रही है, जो सिंचाई के अभाव में खेती नहीं कर पाते थे. गांव में तीन-तीन तालाब खुद जाने से किसानों की सिंचाई की समस्या दूर हो गई है.

विभाग का नहीं मिला अपेक्षित सहयोग

सरकार किसानों को प्रोत्साहित करने का लाख दावा कर ले. मतस्य पालन को बढ़ावा देने का लाख ढिंढोरा पीट ले, लेकिन जमीनी हकीकत सुमित से जब हमने पूछा तो उसने बताया कि भैया ने प्रयास किया था विभाग से सहयोग लेने के लिए लेकिन कागजी प्रक्रिया और इतने बड़े तालाब के लिए जितने का अनुदान विभाग की ओर से मिला वह नाकाफी था. उसने बताया कि महज 65 हजार का अनुदान तालाब खुदाई के लिए मिला. मछली के चारा और उसके भोजन पर सब्सीडी विभाग द्वारा नहीं मिला, न ही अधिकारी एक बार भी तालाब का मुआयना करने ही पहुंचे. उसने बताया कि सरकार को ऐसे प्रोजेक्ट को बढ़ावा देने के लिए सक्षम अधिकारियों को बहाल करने होंगे, जो मतस्य पालको को समय-समय पर मार्गदर्शन कराने का काम करे.

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