हलाल और झटका की राजनीति में; मछलियों के मामले में चुप्पी क्यों? क्यों न उन्हें पानी में ही झटका दिया जाए

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संजय कुमार सिंह

जमशेदपुर में मेरे मोहल्ले में शुरू में मांस की दो दुकानें थीं। दोनों सुबह में एक बकरे के मांस के बराबर ग्राहक हो जाने पर एक बकरा काटते थे और लोग अपनी पसंद का हिस्सा खरीद लेते थे। मैं दोनों दुकानों से खरीदता था और जानता था कि दोनों जगह बकरे को मारने का तरीका अलग है। व्यवस्था से ही समझ में आ जाता है। (अब अवैध विक्रेताओं के अलावा ज्यादातर जानवर स्लॉटर हाउस में कटते हैं, मुर्गे अपवाद हैं) मांस से मतलब होता है कोई भी यही करेगा।

मैंने न किसी ने पूछा, न किसी ने बताया। न खाने वालों ने कभी कुछ कहा। थोड़ा बड़ा हुआ तो पता चला कि एक सिख अंकल मटन नहीं खाते थे। और उसका कारण बताया। मुझे उसमें भी कुछ खास नहीं लगा। सबकी अपनी पसंद – ये तो बताया ही गया था। बाद में जब मांस स्लॉटर हाउस से कटकर आने लगे तो हलाल- झटका छोड़िए यह भी नहीं पहचाना जाए कि जानवर कौन सा है। सब भरोसे का मामला है और चल रहा है। न पहले कोई भेदभाव था न अभी है।

हालांकि, मैं जब तक जमशेदपुर में था स्लॉटर हाउस नहीं थे। मैं जिस कॉलोनी में रहता था वहां कोई भेदभाव नहीं था। मैं जमशेदपुर की बात कर रहा हूं। जहां 1964 में दंगे हुए थे 1979 में फिर हुए। इसके बावजूद ईद पर किसी मुसलमान के घर जाकर सिर्फ मटन खाना और मांग कर खाना भी सामान्य था। 1979 के पहले और बाद में भी। मुझे कभी नहीं बताया गया। न घर में, न किसी धर्म संस्कृति के रक्षक ने बताया।

हलाल-झटका मैंने कभी किसी को पूछते नहीं देखा। लोग उसी अनुसार दुकान पर जाते हों या हर मोहल्ले में कोई खास ही मिलता हो तो मैं नहीं कह सकता। पर कभी किसी ने नहीं बताया कि फलानी दुकान से मटन नहीं खरीदते या उसी दुकान से खरीदते हैं। या कटने के बाद कोई अंतर होता है, पहचानने का कोई तरीका है। ऐसे में अब हलाल झटका का विवाद क्यों शुरू किया जा रहा है यह समझना मुश्किल नहीं है।

पर मेरा कहना है कि अगर जानवर (जीव) के तथाकथित रूप से तड़प कर और एक बार में मर जाने से स्वाद में या खाने वाले के स्वास्थ्य पर कोई अंतर पड़ता होता तो मछलियों को पानी से निकाल कर नहीं – पानी में झटका या हलाल विधि से (जो भी बेहतर हो) मार कर निकाला जाना चाहिए। पानी से निकालने के बाद तो मछली तड़पकर ही मरती है और मरा हुआ जानवर नहीं ही खाना चाहिए।

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